माया चार भईयों से छोटी और लाडली एकमात्र पुत्री थीं … अपने जमींदार पिता और एक स्टेट की एकमात्र राजकुमारी माँ की। पिता अंग्रेंजों से प्रभावित थे सो घर में चौकी व पीढ़े की जगह डाइनिंग टेबल , छूरी और काँटे चलते थे। चीनी मिट्टी के ख़ास बरतन लन्दन और आम बरतन बंगाल पॉटरी के मंगवाये जाते थे। घर की औरतें फिटन में सिर खोलकर शाम को सैर करने जाती। पर्दा प्रथा से ख़ास परहेज़ रखा जाता। महीने में एक बार बड़ी दावत होती जिसमें डांसिंग फ्लोर खूब सजता। मंहगी अंग्रेजी शराब की नदियाँ बह जाती।शिफाॉन और पर्ल्स में सजी भद्र महिलायें और फ्रॉक में सजी अंग्रेजी मेमों से माहौल खिलखिला उठता।
ग्यारहवीं वर्षगाँठ पर पिता से हीरे की सुन्दर बालियाँ मिली और सीतापुर के अमीर खानदान के एकलौते वारिस के फलदान करने आने की सूचना।बारहवें वर्ष में माया अपने घर में गृह प्रवेश कर चौका-चूल्हा संभाल चुकी थी।
पति विदेश में पढ़ाई करने पानी के जहाज पर सवार हो कब चले गए इससे माया अनजान थी। विधवा सास का राज था। स्वयं सत्संग में लीन रह लाल आँखों और झूमते स्वामी जी की आवभगत में हलकान रहती पर बहू कितनी रोटी खाती है इस पर कड़ी नज़र रखती।
प्रथा के अनुसार सवा साल बाद माया पहली विदा नैहर आई। माँ के कलेजे से लग जी हल्का करना चाहा पर हेय दृष्टि से न देखा जाए सोच धीरे से मुस्कुरा कर प्रणाम कर अपने कमरे की शरण गयी।
चौदहवें वर्ष में पति विदेश से आये।साथ लाये एक सुखद बयार। साल भीतर सलोना बालक जीवन में ख़ुशी की पहली झलक लाया।
टाइफाइड का प्रकोप जोरों पर था जो पति और बेटे दोनों को चंद घंटों में लील गया।सास गहन दुःख में डूब गयीं और बिलकुल ही भूल गयी कि मनुष्य से संबोधित रहती हैं या पशु से। स्वामी जी का हस्तक्षेप अधिक हो गया। ख़ास शयन कक्ष उन्हें स्वामी स्वीकार कर चुका था अब यह किसी से छिपा न रहा। पिता जमाता और नाती की तेरहवीं पर आये पर दूर से ही सिर हिला कर अपने महल गए।
सास की क्रूर मंशा उसे हर पल डराने लगी। किसी प्रकार माँ को सेवकों द्वारा ख़बर कराई जिसे भाग्य या दुर्भाग्य से सबसे छोटे भाई ने सुन लिया। माँ की इच्छा के विपरीत जा भाई बहन को जोर जबरदस्ती से घर ले आया।
यह वह समय था जब देश की आज़ादी की घोषणा हो चुकी थी। माया को भी संग आज़ादी मिली।
महादेवी जी के विद्यालय में शिक्षा हुई। एल टी करवा भाई ने आर्य कन्या विद्यालय में अध्यापिका के पद पर नौकरी दिलवाई। हाँ यह जरूर हुआ कि इस कृत्य से पिता-माता से अलग होना पड़ा।
वक़्त बदला और मंझले डॉक्टर भाई ने दिल्ली के प्रतिष्ठित विधुर व्यवसाई से पुनर्विवाह करवाया। पिता-माता का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
किन्तु ……… स्त्री तो आखिर स्त्री ही होती है। अपना प्रारब्ध नहीं बदल सकती। अत्याचारी , शराबी और जुआरी पति के हंटर हर रात पीठ उधेड़ते रहे। डॉक्टर भाई ने उसके विवाह पूर्व के गहनों से पत्नी का श्रृंगार तो पूरा कर दिया पर किस मोल पर यह क्षण भर न सोचा।
विवाह के पश्चात् माया कई वर्षों बाद पहली बार राखी बाँधने आने वाली थी छोटे भाई के घर …… पर ख़बर आई कि अस्पताल में है , देखना है तो आ जाओ।
प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से ओजपूर्ण भाषण कर रही थीं। नारे गूंज रहे थे " स्वतन्त्रता दिवस जिन्दाबाद "। देश झूम रहा था स्वतन्त्रता के पावन पर्व की गरिमा पर। और उधर अस्पताल में बहन की मृत सूरत से मिलन हो रहा था छोटे भईया का …………
आज माया का जन्मदिन है। होती तो 83 वर्ष की होती।
( यह कहानी नहीं है।)
[ कुछ समय बाद पुन: ..... ]
ग्यारहवीं वर्षगाँठ पर पिता से हीरे की सुन्दर बालियाँ मिली और सीतापुर के अमीर खानदान के एकलौते वारिस के फलदान करने आने की सूचना।बारहवें वर्ष में माया अपने घर में गृह प्रवेश कर चौका-चूल्हा संभाल चुकी थी।
पति विदेश में पढ़ाई करने पानी के जहाज पर सवार हो कब चले गए इससे माया अनजान थी। विधवा सास का राज था। स्वयं सत्संग में लीन रह लाल आँखों और झूमते स्वामी जी की आवभगत में हलकान रहती पर बहू कितनी रोटी खाती है इस पर कड़ी नज़र रखती।
प्रथा के अनुसार सवा साल बाद माया पहली विदा नैहर आई। माँ के कलेजे से लग जी हल्का करना चाहा पर हेय दृष्टि से न देखा जाए सोच धीरे से मुस्कुरा कर प्रणाम कर अपने कमरे की शरण गयी।
चौदहवें वर्ष में पति विदेश से आये।साथ लाये एक सुखद बयार। साल भीतर सलोना बालक जीवन में ख़ुशी की पहली झलक लाया।
टाइफाइड का प्रकोप जोरों पर था जो पति और बेटे दोनों को चंद घंटों में लील गया।सास गहन दुःख में डूब गयीं और बिलकुल ही भूल गयी कि मनुष्य से संबोधित रहती हैं या पशु से। स्वामी जी का हस्तक्षेप अधिक हो गया। ख़ास शयन कक्ष उन्हें स्वामी स्वीकार कर चुका था अब यह किसी से छिपा न रहा। पिता जमाता और नाती की तेरहवीं पर आये पर दूर से ही सिर हिला कर अपने महल गए।
सास की क्रूर मंशा उसे हर पल डराने लगी। किसी प्रकार माँ को सेवकों द्वारा ख़बर कराई जिसे भाग्य या दुर्भाग्य से सबसे छोटे भाई ने सुन लिया। माँ की इच्छा के विपरीत जा भाई बहन को जोर जबरदस्ती से घर ले आया।
यह वह समय था जब देश की आज़ादी की घोषणा हो चुकी थी। माया को भी संग आज़ादी मिली।
महादेवी जी के विद्यालय में शिक्षा हुई। एल टी करवा भाई ने आर्य कन्या विद्यालय में अध्यापिका के पद पर नौकरी दिलवाई। हाँ यह जरूर हुआ कि इस कृत्य से पिता-माता से अलग होना पड़ा।
वक़्त बदला और मंझले डॉक्टर भाई ने दिल्ली के प्रतिष्ठित विधुर व्यवसाई से पुनर्विवाह करवाया। पिता-माता का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।
किन्तु ……… स्त्री तो आखिर स्त्री ही होती है। अपना प्रारब्ध नहीं बदल सकती। अत्याचारी , शराबी और जुआरी पति के हंटर हर रात पीठ उधेड़ते रहे। डॉक्टर भाई ने उसके विवाह पूर्व के गहनों से पत्नी का श्रृंगार तो पूरा कर दिया पर किस मोल पर यह क्षण भर न सोचा।
विवाह के पश्चात् माया कई वर्षों बाद पहली बार राखी बाँधने आने वाली थी छोटे भाई के घर …… पर ख़बर आई कि अस्पताल में है , देखना है तो आ जाओ।
प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से ओजपूर्ण भाषण कर रही थीं। नारे गूंज रहे थे " स्वतन्त्रता दिवस जिन्दाबाद "। देश झूम रहा था स्वतन्त्रता के पावन पर्व की गरिमा पर। और उधर अस्पताल में बहन की मृत सूरत से मिलन हो रहा था छोटे भईया का …………
आज माया का जन्मदिन है। होती तो 83 वर्ष की होती।
( यह कहानी नहीं है।)
[ कुछ समय बाद पुन: ..... ]
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