मुंशी चाचा के घर से बड़ा घरौटन रहा। मुंशियाइन चाची अपने दिल का हाल दादी से बिन बताये रह नहीं पाती रहीं। जिस रोज कोई कनफुसकी करनी होती उस रोज भिनसारे ही नौ बजते ही दादाजी की फिटन निकलने को अगोरा जाने लगता। उनकी मिसराइन पोर्टिको के चार फेरा लगा जाती और इधर फिटन विदा हुई और सदर फाटक तक पहुँची उधर मिसराइन खिलखिलाती हुई हाज़िर हो जातीं। हाथ में उनके कुछ खाने के सामान की थाली होती जो हमेशा बेल-बूटे की भरवां कढ़ाई वाले थालपोश से ढकी रहती। दर की झुट्ठी थी वो। लहरा कर कहती, “ अरे मलकिनी साहेब ! जरा सी देर हुई गयी ,नहीं तो बड़के बाबू साहेब भी चख लेते तो हम गरीब को अठन्नी चवन्नी नसीब हुई जाती। ” ख़ैर ये मुंशियाइन चाची दोपहरी में तशरीफ़ ला रही हैं का भोपूं होता। दादी महराजिन चाची को देख हुँकारी भरतीं यानी दुपहरी में खरबूजा, आम या जो भी मौसमी फल होता तैयार रहे और साथ में पकवान।
मुंशी जी की तीनों बेटियों का हमारे घर खूब आना जाना रहता। मंझली और छोटकी जीजी से उनका बड़ा सहेलीपना था। उन सबों ने एक दूसरे से दुप्पटा अदला-बदली करा था सो ज़िन्दगी भर की पक्की सहेली बन गईं। सरला, बिमला और कौमुदी तीनों बहनें बड़ी सुंदर थीं। हुनर के नाम पर कौमुदी हीरा थीं। उनका लगभग पूरा दिन ही हमारे घर में बीतता। उनमें से कोई भी बहन न आती तो घर में सन्नाटा लगता।
पल्लू भैया जो बड़े चाचा की सबसे ज़हीन संतान माने जाते थे, ऊपर वाले हॉल में कोने में पड़ी आरामकुर्सी पर डेरा जमाये मोटी-मोटी किताबों में सिर घुसाये रहते। वहीं हॉल में हम सब लड़कियाँ अपनी चौपाल सजाये रहतीं। हमारी हँसी जब बुलंद होकर खिड़की की चिक के पार जाने को होती तो पल्लू भैया की आवाज़ गूँजती “ अल्लाह तौबा , कुछ रहम करें आप लोग भरी दुपहरी पर। ” उनकी आवाज़ से हमें उनकी मौजूदगी का अहसास होता।
हमारे ऊन के गोले या क्रोशिया के धागों के गुल्ले ( गोले ) जब लुढ़क जाते तो उनको बटोर कर लाने का जिम्मा मेरा होता। उस बटोरने-बीनने के दरमियान कौमुदी और पल्लू भैया की टकराती, कुछ महीन सी मुस्कुराती आँखों का सफ़र बहुत कुछ कहता मालूम देता।
कई बार कौमुदी कुछ लाने नीचे रसोई या भंडार तक जाती तो थोड़ी ही देर में पल्लू भैया की कुर्सी खाली दिख जाती। दोपहर में कपड़े धुल कर आँगन में सुखाये जाते थे। कभी सभी रस्सियाँ भर जातीं तो बाल्टियाँ ऊपर छत पर गंगाराम पहुँचा देता जिसे फैलाने की जिम्मेदारी हम लड़कियों की थी जिसे सबने कौमुदी के सिर पर डाल दिया था। इधर कौमुदी कपड़े सुखाने गयीं और उधर पल्लू भैया को सोवास लग जाती और वे अपने कमरे में सोने चले जाते।
एक दिन मेरी कढ़ाई के रेशमी धागों की लच्छी का डिब्बा नहीं मिल रहा था। सभी से पूछा पर किसी ने नहीं देखा था। मैंने कौमुदी के झोले में देखा। एक पर्ची ऊपर ही पड़ी थी। लिखा था, “ चाँदनी रात में नौका विहार ” ... राइटिंग तो पक्का पल्लू भैया की ही थी पर कौमुदी के झोले में क्यों यह हैरान कर गया। आव देखा न ताव मैं जीने ( सीढ़ी ) पर भागी। आख़िर दो तीन पायदान रह गयी थीं कि सुनाई दिया, “ अब जाने दीजिए, चाँदनी रात ख़त्म हुई , किसी को पता चल गया तो बाबूजी बहुत फ़जीहत करेंगें। ”
ये इश्क़-ए-दोपहरी का मुआमला ठहरा। किसी को कानो कान ख़बर न हुई और बेल परवान चढ़ती गयी। मुझे दोनों ही तरफ डाकिया की पदवी से आबाद कर दिया गया था। रंगीन, महकते रुक्के एक से दूसरे और दूसरे से लाने- ले जाने के लिए मेरी खूब आवभगत होती।
वक़्त के साथ सरला बिमला ब्याह गयीं। बारी कौमुदी की थी। पल्लू भैया वकालत की बड़ी पढ़ाई करने विलायत जा चुके थे। लड़के वाले कौमुदी को देखने आने लगे। लड़की पसन्द आती किन्तु लाल हरे नोट की गड्डी कम पड़ जाती। कौमुदी हर बार कहती भोले बाबा हमारे साथ हैं, अन्याय न होने देंगें। वह कहाँ जानती थी कि भोले बाबा तो पत्थर का एक टुकड़ा मात्र हैं। ब्याह हो गया और कौमुदी बिदाई में मेरे गले लग कर ऐसा रोईं कि लगा बकरी ज़िब्हा कर दी गयी। चुपके से एक हथेली ने दूसरी हथेली में एक रुक्का थमा दिया। बहुत बड़ी जिम्मेदारी सौंप गयी कौमुदी जिसे असली दूसरी हथेली तक पहुँचाना था।
तीन या शायद चार बरस तक अक्सर वह रुक्का अपनी पनीली आँखे दिखाता रहा फिर अलमारी के किसी कोने में थक कर सो गया। पाँच साल बाद पल्लू भैया लौटे। उनकी हँसी गंभीरता के भीतर गुम हो गयी थी।
तीसरे दिन उनकी अमानत सौंपने उनके कमरे में गयी। वे न जाने छत को एकटक देखते हुए क्या तलाश रहे थे। उनके कमरे के ऊपर तो हॉल था जो अब अधिकतर बन्द ही रहता था क्योंकि मुझे छोड़ कर सभी लड़कियाँ डोली में चढ़ गयीं थीं।
मैंने बिना कुछ बोले पहली हथेली आगे बढ़ाई।
दूसरी हथेली हथेली न आगे बढ़ी और न खुली।
सिर्फ एक आवाज़ आई, “ वो बहुत रोई होगी न ......। ”
बरसों बीत गए ...
कौमुदी और पल्लू भैया आज भी अपने मिलने की चाँदनी रात की राह देख रहे हैं।
यह प्रेम कहानी तीन लोगों के सीने में दफ़न होकर रह गयी।