Thursday, 13 August 2020

एक स्त्री ...

माया चार भईयों से छोटी और लाडली एकमात्र पुत्री थीं … अपने जमींदार पिता और एक स्टेट की एकमात्र राजकुमारी माँ की। पिता अंग्रेंजों से प्रभावित थे सो घर में चौकी व पीढ़े की जगह डाइनिंग टेबल , छूरी और काँटे चलते थे। चीनी मिट्टी के ख़ास बरतन लन्दन और आम बरतन बंगाल पॉटरी के मंगवाये जाते थे। घर की औरतें फिटन में सिर खोलकर शाम को सैर करने जाती। पर्दा प्रथा से ख़ास परहेज़ रखा जाता। महीने में एक बार बड़ी दावत होती जिसमें डांसिंग फ्लोर खूब सजता। मंहगी अंग्रेजी शराब की नदियाँ बह जाती।शिफाॉन और पर्ल्स में सजी भद्र महिलायें और फ्रॉक में सजी अंग्रेजी मेमों से माहौल खिलखिला उठता।

ग्यारहवीं वर्षगाँठ पर पिता से हीरे की सुन्दर बालियाँ मिली और सीतापुर के अमीर खानदान के एकलौते वारिस के फलदान करने आने की सूचना।बारहवें वर्ष में माया अपने घर में गृह प्रवेश कर चौका-चूल्हा संभाल चुकी थी।

पति विदेश में पढ़ाई करने पानी के जहाज पर सवार हो कब चले गए इससे माया अनजान थी। विधवा सास का राज था। स्वयं सत्संग में लीन रह लाल आँखों और झूमते स्वामी जी की आवभगत में हलकान रहती पर बहू कितनी रोटी खाती है इस पर कड़ी नज़र रखती।

प्रथा के अनुसार सवा साल बाद माया पहली विदा नैहर आई। माँ के कलेजे से लग जी हल्का करना चाहा पर हेय दृष्टि से न देखा जाए सोच धीरे से मुस्कुरा कर प्रणाम कर अपने कमरे की शरण गयी।

चौदहवें वर्ष में पति विदेश से आये।साथ लाये एक सुखद बयार। साल भीतर सलोना बालक जीवन में ख़ुशी की पहली झलक लाया।

टाइफाइड का प्रकोप जोरों पर था जो पति और बेटे दोनों को चंद घंटों में लील गया।सास गहन दुःख में डूब गयीं और बिलकुल ही भूल गयी कि मनुष्य से संबोधित रहती हैं या पशु से। स्वामी जी का हस्तक्षेप अधिक हो गया। ख़ास शयन कक्ष उन्हें स्वामी स्वीकार कर चुका था अब यह किसी से छिपा न रहा। पिता जमाता और नाती की तेरहवीं पर आये पर दूर से ही सिर हिला कर अपने महल गए।

सास की क्रूर मंशा उसे हर पल डराने लगी। किसी प्रकार माँ को सेवकों द्वारा ख़बर कराई जिसे भाग्य या दुर्भाग्य से सबसे छोटे भाई ने सुन लिया। माँ की इच्छा के विपरीत जा भाई बहन को जोर जबरदस्ती से घर ले आया।

यह वह समय था जब देश की आज़ादी की घोषणा हो चुकी थी। माया को भी संग आज़ादी मिली।

महादेवी जी के विद्यालय में शिक्षा हुई। एल टी करवा भाई ने आर्य कन्या विद्यालय में अध्यापिका के पद पर नौकरी दिलवाई। हाँ यह जरूर हुआ कि इस कृत्य से पिता-माता से अलग होना पड़ा।

वक़्त बदला और मंझले डॉक्टर भाई ने दिल्ली के प्रतिष्ठित विधुर व्यवसाई से पुनर्विवाह करवाया। पिता-माता का आशीर्वाद प्राप्त हुआ।

किन्तु ……… स्त्री तो आखिर स्त्री ही होती है। अपना प्रारब्ध नहीं बदल सकती। अत्याचारी , शराबी और जुआरी पति के हंटर हर रात पीठ उधेड़ते रहे। डॉक्टर भाई ने उसके विवाह पूर्व के गहनों से पत्नी का श्रृंगार तो पूरा कर दिया पर किस मोल पर यह क्षण भर न सोचा।

विवाह के पश्चात् माया कई वर्षों बाद पहली बार राखी बाँधने आने वाली थी छोटे भाई के घर …… पर ख़बर आई कि अस्पताल में है , देखना है तो आ जाओ।

प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से ओजपूर्ण भाषण कर रही थीं। नारे गूंज रहे थे " स्वतन्त्रता दिवस जिन्दाबाद "। देश झूम रहा था स्वतन्त्रता के पावन पर्व की गरिमा पर। और उधर अस्पताल में बहन की मृत सूरत से मिलन हो रहा था छोटे भईया का …………

आज माया का जन्मदिन है। होती तो 83 वर्ष की होती।

( यह कहानी नहीं है।)

[ कुछ समय बाद पुन: ..... ]

Monday, 10 August 2020

फोटू खेंचक

 हमारे बचपन में श्याम चाचा जी आते थे जो खुद को फोटोग्राफर कहते थे। गले में तीन कैमरा लटकाए रहते थे। इंसान तो इंसान वो तो दरवाजा, खिड़की, उसमें लगी सिटकनी-बेलन-कब्जा सबकी फोटो खींच लेते। 

बाबा से कहकर एक कमरा आउट हाउस में लिए थे जो न जाने क्यों बल्ब विहीन रखते थे। घुड़प अँधेरे में तमाम थाली जैसे बर्तन में पानी जैसा कुछ भरे रहते थे। उसमें से न मालूम कैसे जादू से चिड़िया उड़ी वाली फोटो निकाल लेते थे। 

घर का हर बड़ा इंसान उनकी फोटो के रेले से दूर भागता था। श्याम चाचा जी जब फोटो दिखाने लाते तो मानो सावन का मेला दौड़ता चला आता जिससे सब खौफ़ खाते कि देखने बैठे तो भरी जेठ की दुपहरी से पूस की कड़कड़ाती ठंडी उतर आवेगी पर फोटो की भीड़ नहीं कम होगी। पकड़े हम बच्चे जाते जो चाचा जी की फोटो गैलरी के सबसे क़ाबिल दर्शक बनते।

गांव में नई नई बिजली आई थी। ईश्वर जाने श्याम चाचा जी बिजली के खम्बे से क्यों इतनी मोहब्बत कर बैठे कि जब देखो छिपकली की तरह फर्र से ऊपर जाकर बैठ जाते। फिर तो उनकी तन्मयता देखते ही बनती थी। एक के बाद एक उनके कैमरे चलते। खटाखट फोटो खींचते जाते। बस हम बच्चे यही नहीं समझ पाते कि ई भला चिड़िया-चुनगुन , अकान-मकान की फोटो भला काहे खींचते रहते हैं ये। 

बुआ लोग तो देखते ही कहतीं बुड़बक कहीं के। हमारे बड़के फूफा जी जब भी आते श्याम चाचा जी भी उनके आने से जाने तक हमारे घर के स्थाई सदस्य हो जाते। फूफाजी को विभिन्न भंगिमाओं, ऊलजलूल वस्त्र में फोटो खिंचवाने का बड़ा शौक था। सो दामाद साहब दमदुल्ली बन जाते और दिन भर स्वांग रचाते।

श्याम चाचा जी हमारे घर के ऑफिशियल फोटू खेंचक थे। हर पार्टी, त्यौहार, छोटे बड़े पारिवारिक जनेऊ मुण्डन, ब्याह बारात आदि के फोटो सब उनके द्वारा ही खींची गई जो आज भी आंखों में आँसू ला देती है। 

उनकी खींची फोटो और उनके तमाम नेगेटिव और कांच की स्लाइड आज भी धरोहर सी अम्माँ संजोये हुए हैं। 

वह एक युग था जिसमें इंसान इंसान को पहचानता और स्नेह सहित आदर-मान देता था। एक रिश्ता सबके बीच अदृश्य धागे से बंधा रहता था। एक दूसरे पर भरोसा था। एक के आँसू दूसरे की आँख से भी बहते थे।


यादें हैं ..... मेरी।

Sunday, 9 August 2020

गांव मेरे भीतर रहता है .....

लॉक डाउन से अब तक उलट पलट करके न जाने कितनी पुरानी यादों से सामना हो रहा है। कभी कोई चूड़ी, कभी कोई चुन्नी, कोई कढ़ाई वाला रुमाल , कोई पुराना सरारा सूट, कोई पुरानी आर्टिफिशियल ज्वेलरी , पुरानी कलम और डायरी , रंगीन पेंसिलें और चॉक .... सिलसिला यहीं नहीं थमता .... जब फ़ोटो एल्बम खुलते हैं तो श्याम श्वेत पिक्चर्स का पिटारा खुल जाता है और हर तस्वीर अचानक बोलने लगती है। लगता ही नहीं कि अब इसमें सब सिर्फ काला सफ़ेद ही शेष है ....। 

घर मिला गांव का जिसमें बाबा-दादी नहीं थे जिनकी रौनक से ईंट की दीवारें घर बनी थीं। सब कुछ विदा कह गया ....। कभी गूँजते थे अनगिनत ठहाके वहाँ। बच्चों की किलकारी से मुस्कुराता था आँगन। आँगन में था नीम का विशाल पेड़ जिसकी डाल पर झूला बारहों मास पड़ा रहता।

रसोई जब देखो आबाद मिलती मानो लंगर खुला हो। किसी को बिना खाये कभी लौटकर न जाते देखा और न किसी को कभी भूखे सोते देखा।

एक के आँसू दूसरे की आँख से बहते देखा। खुद से बढ़कर दूसरों की खुशियों का उत्सव मनाते देखा।

अब न जाने कितने वर्षों से घर सबके लौटने की राह देखता है। सदर फाटक पर बड़ा सा अलीगढ़ी ताला लटकता मिलता है।

डाकिया अब कोई डाक भी तो नहीं लाता। घर का पता अब लापता हो चला है ......।




यादों के दरीचे से

गुमसुम सी गुज़र रही थी 

मैं !


मंज़र बचपन का उभर आया था 

दर-ओ-दीवार पर 

इक अक्स उभरते देख रही थी 

मैं !


अपनों से मिलने 

और 

अपनों से बिछड़ने का बही खाता 

इन्हीं दीवारों में रहता है क़ैद !


आवाज़ दे देकर पुकारते हैं 

बन्द राजमहल !! 


जिसके आँगन में खेलती थी कभी 

गुड़िया से 

जहाँ बरसता था अपनों का प्यार,

बिछड़ गया हर अपना 

फिसल गया हाथों से सारा राजपाट ...।


पुरानी गलियों से 

चौक और चौराहों को विदा लेते देखा, 

गांव को गांव से विदा कहते देखा।


मकबरे, मंदिर सबको एक दूजे से जुदा होते देखा,

बन्दगी को झुकते सिर को झटके से मुड़ते देखा।


पुराने नामों को गुम होते देखा,

नए नामों का उगता सवेरा देखा।


इक गांव जो रहता था मेरे भीतर 

उसको खुद से अलविदा कहते देखा !!!



माई री मैं का से कहूँ पीर अपने जिया की .....

वो जो हममें तुममें क़रार था .....

  मुंशी चाचा के घर से बड़ा घरौटन रहा। मुंशियाइन चाची अपने दिल का हाल दादी से बिन बताये रह नहीं पाती रहीं। जिस रोज कोई कनफुसकी करनी होती उस रो...