Sunday, 9 August 2020

गांव मेरे भीतर रहता है .....

लॉक डाउन से अब तक उलट पलट करके न जाने कितनी पुरानी यादों से सामना हो रहा है। कभी कोई चूड़ी, कभी कोई चुन्नी, कोई कढ़ाई वाला रुमाल , कोई पुराना सरारा सूट, कोई पुरानी आर्टिफिशियल ज्वेलरी , पुरानी कलम और डायरी , रंगीन पेंसिलें और चॉक .... सिलसिला यहीं नहीं थमता .... जब फ़ोटो एल्बम खुलते हैं तो श्याम श्वेत पिक्चर्स का पिटारा खुल जाता है और हर तस्वीर अचानक बोलने लगती है। लगता ही नहीं कि अब इसमें सब सिर्फ काला सफ़ेद ही शेष है ....। 

घर मिला गांव का जिसमें बाबा-दादी नहीं थे जिनकी रौनक से ईंट की दीवारें घर बनी थीं। सब कुछ विदा कह गया ....। कभी गूँजते थे अनगिनत ठहाके वहाँ। बच्चों की किलकारी से मुस्कुराता था आँगन। आँगन में था नीम का विशाल पेड़ जिसकी डाल पर झूला बारहों मास पड़ा रहता।

रसोई जब देखो आबाद मिलती मानो लंगर खुला हो। किसी को बिना खाये कभी लौटकर न जाते देखा और न किसी को कभी भूखे सोते देखा।

एक के आँसू दूसरे की आँख से बहते देखा। खुद से बढ़कर दूसरों की खुशियों का उत्सव मनाते देखा।

अब न जाने कितने वर्षों से घर सबके लौटने की राह देखता है। सदर फाटक पर बड़ा सा अलीगढ़ी ताला लटकता मिलता है।

डाकिया अब कोई डाक भी तो नहीं लाता। घर का पता अब लापता हो चला है ......।




यादों के दरीचे से

गुमसुम सी गुज़र रही थी 

मैं !


मंज़र बचपन का उभर आया था 

दर-ओ-दीवार पर 

इक अक्स उभरते देख रही थी 

मैं !


अपनों से मिलने 

और 

अपनों से बिछड़ने का बही खाता 

इन्हीं दीवारों में रहता है क़ैद !


आवाज़ दे देकर पुकारते हैं 

बन्द राजमहल !! 


जिसके आँगन में खेलती थी कभी 

गुड़िया से 

जहाँ बरसता था अपनों का प्यार,

बिछड़ गया हर अपना 

फिसल गया हाथों से सारा राजपाट ...।


पुरानी गलियों से 

चौक और चौराहों को विदा लेते देखा, 

गांव को गांव से विदा कहते देखा।


मकबरे, मंदिर सबको एक दूजे से जुदा होते देखा,

बन्दगी को झुकते सिर को झटके से मुड़ते देखा।


पुराने नामों को गुम होते देखा,

नए नामों का उगता सवेरा देखा।


इक गांव जो रहता था मेरे भीतर 

उसको खुद से अलविदा कहते देखा !!!



माई री मैं का से कहूँ पीर अपने जिया की .....

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