हमारे बचपन में श्याम चाचा जी आते थे जो खुद को फोटोग्राफर कहते थे। गले में तीन कैमरा लटकाए रहते थे। इंसान तो इंसान वो तो दरवाजा, खिड़की, उसमें लगी सिटकनी-बेलन-कब्जा सबकी फोटो खींच लेते।
बाबा से कहकर एक कमरा आउट हाउस में लिए थे जो न जाने क्यों बल्ब विहीन रखते थे। घुड़प अँधेरे में तमाम थाली जैसे बर्तन में पानी जैसा कुछ भरे रहते थे। उसमें से न मालूम कैसे जादू से चिड़िया उड़ी वाली फोटो निकाल लेते थे।
घर का हर बड़ा इंसान उनकी फोटो के रेले से दूर भागता था। श्याम चाचा जी जब फोटो दिखाने लाते तो मानो सावन का मेला दौड़ता चला आता जिससे सब खौफ़ खाते कि देखने बैठे तो भरी जेठ की दुपहरी से पूस की कड़कड़ाती ठंडी उतर आवेगी पर फोटो की भीड़ नहीं कम होगी। पकड़े हम बच्चे जाते जो चाचा जी की फोटो गैलरी के सबसे क़ाबिल दर्शक बनते।
गांव में नई नई बिजली आई थी। ईश्वर जाने श्याम चाचा जी बिजली के खम्बे से क्यों इतनी मोहब्बत कर बैठे कि जब देखो छिपकली की तरह फर्र से ऊपर जाकर बैठ जाते। फिर तो उनकी तन्मयता देखते ही बनती थी। एक के बाद एक उनके कैमरे चलते। खटाखट फोटो खींचते जाते। बस हम बच्चे यही नहीं समझ पाते कि ई भला चिड़िया-चुनगुन , अकान-मकान की फोटो भला काहे खींचते रहते हैं ये।
बुआ लोग तो देखते ही कहतीं बुड़बक कहीं के। हमारे बड़के फूफा जी जब भी आते श्याम चाचा जी भी उनके आने से जाने तक हमारे घर के स्थाई सदस्य हो जाते। फूफाजी को विभिन्न भंगिमाओं, ऊलजलूल वस्त्र में फोटो खिंचवाने का बड़ा शौक था। सो दामाद साहब दमदुल्ली बन जाते और दिन भर स्वांग रचाते।
श्याम चाचा जी हमारे घर के ऑफिशियल फोटू खेंचक थे। हर पार्टी, त्यौहार, छोटे बड़े पारिवारिक जनेऊ मुण्डन, ब्याह बारात आदि के फोटो सब उनके द्वारा ही खींची गई जो आज भी आंखों में आँसू ला देती है।
उनकी खींची फोटो और उनके तमाम नेगेटिव और कांच की स्लाइड आज भी धरोहर सी अम्माँ संजोये हुए हैं।
वह एक युग था जिसमें इंसान इंसान को पहचानता और स्नेह सहित आदर-मान देता था। एक रिश्ता सबके बीच अदृश्य धागे से बंधा रहता था। एक दूसरे पर भरोसा था। एक के आँसू दूसरे की आँख से भी बहते थे।
यादें हैं ..... मेरी।
यादें कैमरे से निकल कर आपके पास सजीव हैं.
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